पुराने घर की खामोश दहलीज
शाम के धुंधलके में जब सूरज की आखिरी किरणें कमरे के कोने में रखे उस पुराने ट्रंक पर पड़ती हैं, तो पिंकी की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है। यह चमक खुशी की नहीं, बल्कि उन आंसुओं की नमी है जो पिछले दस सालों से उसकी पलकों पर डेरा डाले हुए हैं। पिंकी आज भी उसी खिड़की के पास बैठती है, जहां से सड़क का वो मोड़ साफ नजर आता है, जहां से कभी नरेंद्र अपनी साइकिल की घंटी बजाते हुए घर लौटता था।
पिंकी और नरेंद्र की कहानी कोई फिल्मी कहानी नहीं थी, लेकिन उसमें जो गहराई थी, वह शायद ही कहीं और मिले। वे एक छोटे से शहर के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनकी शादी को अभी केवल पांच साल ही हुए थे कि वक्त ने अपनी करवट बदल ली। आज पिंकी के हाथ में चाय का वही प्याला है, जो कभी नरेंद्र को बेहद पसंद था। वह अक्सर कहता था, "पिंकी, तुम्हारे हाथ की चाय में वो जादू है कि दिन भर की थकान पल भर में गायब हो जाती है।" आज चाय वही है, स्वाद भी शायद वही हो, पर उसे पीने वाला वो इंसान पास नहीं है।
"तुम्हें जितना भुलाते हैं, तुम उतना ही याद आते हो... यह सिलसिला न जाने कब थमेगा, या शायद यह मेरी सासों के साथ ही खत्म होगा।"
वो पहली मुलाकात और मासूम सपने
पिंकी को याद है वो दिन, जब वह पहली बार नरेंद्र से मिली थी। एक शादी समारोह में, जहां चारों तरफ शोर-शराबा था, लेकिन नरेंद्र एक कोने में बैठा शांति से किताब पढ़ रहा था। पिंकी को उसकी यही सादगी भा गई थी। जब उनकी बात शुरू हुई, तो लगा जैसे सदियों की जान-पहचान हो। नरेंद्र स्वभाव से बेहद सरल और शांत था, जबकि पिंकी चुलबुली और बातों की शौकीन।
शादी के बाद के वो दिन सुनहरे सपनों की तरह थे। नरेंद्र एक छोटी सी सरकारी नौकरी करता था, लेकिन उसने पिंकी की हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखा। महीने की आखिरी तारीख को जब पैसे कम पड़ जाते, तो नरेंद्र अपनी जरूरतें मार लेता, लेकिन पिंकी के लिए उसकी पसंद की गजरे या कोई छोटी सी बिंदी लाना कभी नहीं भूलता था। वह अक्सर कहता था, "पिंकी, महल तो नहीं दे सकता, पर इस छोटे से घर को खुशियों से जरूर भर दूंगा।" और उसने किया भी वैसा ही था।
खुशियों पर ग्रहण और वो काली रात
जिंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी कि अचानक एक दिन नरेंद्र की तबीयत बिगड़ने लगी। पहले लगा कि मामूली थकान है, पर जब जांच हुई तो पता चला कि उसके दिल में एक बड़ा छेद है और सर्जरी की तुरंत जरूरत है। पिंकी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने अपनी सारी जमा-पूंजी, गहने और यहां तक कि अपना मायके वाला हिस्सा भी लगा दिया, ताकि नरेंद्र ठीक हो सके।
अस्पताल के उस सफेद गलियारे में पिंकी रात-रात भर जागकर दुआएं मांगती थी। ऑपरेशन कामयाब रहा, और कुछ दिनों के लिए लगा कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक रात, जब बारिश बहुत तेज हो रही थी, नरेंद्र को अचानक सांस लेने में दिक्कत हुई। पिंकी ने डॉक्टरों को पुकारा, हाथ-पैर जोड़े, लेकिन जब तक मदद पहुंचती, नरेंद्र की आंखों की चमक हमेशा के लिए शांत हो चुकी थी।
उस रात पिंकी की चीखें उस बारिश के शोर में दबकर रह गईं। वह नरेंद्र का हाथ पकड़े रही, जैसे कह रही हो कि "अभी तो हमें साथ में बूढ़ा होना था, अभी तो हमें वो छोटा सा बगीचा बनाना था... तुम ऐसे कैसे जा सकते हो?" पर नरेंद्र खामोश था, एक ऐसी खामोशी जो पिंकी की पूरी दुनिया को निगल गई।
तन्हाई का सफर और यादों का बोझ
नरेंद्र के जाने के बाद शुरुआती कुछ महीने पिंकी के लिए एक धुंधलके की तरह थे। लोग आते, सांत्वना देते और चले जाते। किसी ने कहा, "अभी उम्र ही क्या है, दूसरी शादी कर लो," तो किसी ने कहा, "वक्त सब भर देता है।" लेकिन पिंकी जानती थी कि उसके दिल में जो घाव हुआ है, उसे भरने वाला मरहम तो नरेंद्र के साथ ही चला गया।
पिंकी ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। वह नरेंद्र के कपड़ों की खुशबू में उसे ढूंढती। कभी उसकी अलमारी खोलकर बैठ जाती, तो कभी उसकी पुरानी घड़ियों को चाबी देती, इस उम्मीद में कि शायद वक्त पीछे मुड़ जाए। उसे हर पल लगता कि नरेंद्र पीछे से आकर उसके कंधे पर हाथ रखेगा और कहेगा, "पिंकी, चाय बनाओ न!"
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, पिंकी ने खुद को संभालने की कोशिश की। उसने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। लेकिन विडंबना देखिए, वह जितना खुद को काम में व्यस्त रखती, उतना ही नरेंद्र की यादें उसे घेर लेतीं। स्कूल के बच्चों में उसे नरेंद्र की शरारतें दिखतीं, सड़क चलते किसी अजनबी की हंसी में उसे नरेंद्र की खिलखिलाहट सुनाई देती।
वो खत जो कभी भेजा नहीं गया
एक दिन पिंकी नरेंद्र के पुराने कागजात देख रही थी कि उसे एक डायरी मिली। उस डायरी के आखिरी पन्ने पर नरेंद्र ने पिंकी के लिए कुछ लिखा था। शायद उसे अपनी मौत का आभास हो गया था। उसमें लिखा था:
"पिंकी, अगर कभी मैं तुम्हारे पास न रहूं, तो उदास मत होना। मैं तुम्हारे साथ बिताए हर पल में जीवित रहूंगा। तुम जब भी मुस्कुराओगी, मेरी आत्मा को सुकून मिलेगा। अपनी जिंदगी को सिर्फ मेरी यादों के मातम में मत गुजारना, बल्कि मेरी उन अधूरी इच्छाओं को पूरा करना जो हम दोनों ने साथ देखी थीं।"
यह पढ़कर पिंकी फूट-फूटकर रोने लगी। उसे एहसास हुआ कि नरेंद्र उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता था। लेकिन भूलना इतना आसान कहां होता है? वह जितना भुलाने की कोशिश करती, वो पुरानी बातें, वो बारिश में साथ भीगना, वो छोटी-छोटी तकरारें और फिर प्यार से मनाना—सब कुछ ताजा हो जाता।
निष्कर्ष: एक अधूरा सच
आज दस साल हो गए हैं। पिंकी अब अकेली नहीं है, उसके पास नरेंद्र की यादों का एक विशाल समंदर है। वह अब रोती नहीं है, बस उसकी आंखों में एक ठहराव आ गया है। वह समझ गई है कि कुछ लोग जिंदगी से जा सकते हैं, पर वे दिल से कभी नहीं निकलते।
हर शाम, जब वह घर की बत्तियां जलाती है, तो एक दिया नरेंद्र की तस्वीर के सामने भी रखती है। वह तस्वीर से बातें करती है, अपना पूरा दिन बताती है। लोग उसे पागल कहते होंगे, पर उसके लिए नरेंद्र आज भी वहीं है। उसकी यादें पिंकी के वजूद का हिस्सा बन चुकी हैं।
कहानी का अंत भले ही बिछड़ने पर हुआ हो, पर पिंकी का प्यार आज भी उतना ही जवान है। वह आज भी डायरी में लिखती है— "नरेंद्र, तुम्हें जितना भुलाने की कोशिश करती हूं, तुम उतने ही शिद्दत से याद आते हो। शायद यही मेरा नसीब है, और शायद यही मेरा सुकून भी।"
पिंकी और नरेंद्र की यह दास्तान हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं है। यह तो उस एहसास का नाम है जो जाने वाले के बाद भी आपके भीतर जीवित रहता है, आपको हर दिन थोड़ा और बेहतर इंसान बनाने की कोशिश करता है, भले ही आंखों में आंसू क्यों न हों।
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