विगत की परछाइयां और एक अनकहा दर्द
खिड़की के बाहर सावन की पहली फुहारें गिर रही थीं, लेकिन पिंकी के मन में जैसे कोई बंजर रेगिस्तान सुलग रहा था। हाथ में चाय का प्याला ठंडा हो चुका था और उसकी निगाहें सामने की दीवार पर टंगी उस खाली जगह पर टिकी थीं, जहाँ कभी नरेंद्र की तस्वीर हुआ करती थी। उसने वह तस्वीर हटा दी थी, इस उम्मीद में कि शायद आँखों के सामने से ओझल होने पर वह दिल से भी ओझल हो जाए। पर अफ़सोस, यादें दीवार पर टंगी तस्वीरों की मोहताज नहीं होतीं।
पिंकी ने गहरी सांस ली और आँखें मूँद लीं। बंद आँखों के पीछे भी नरेंद्र का ही चेहरा था—वही शरारती मुस्कुराहट, वही गहरी आँखें जिनमें पिंकी को अपना पूरा ब्रह्मांड नज़र आता था। उसे वह दिन याद आया जब उसने कसम खाई थी कि वह नरेंद्र का नाम तक अपनी ज़ुबान पर नहीं लाएगी। उसने उसकी दी हुई हर चीज़, हर खत, हर तोहफ़ा एक पुराने संदूक में बंद करके स्टोर रूम के अंधेरे कोने में डाल दिया था। पर दिल का क्या करे? वह जितना खुद को काम में व्यस्त रखती, जितना लोगों से हँसकर मिलती, एकांत में वही यादें उसे और ज़ोर से जकड़ लेतीं।
"तुम्हें जितना भुलाते हैं, तुम उतना ही याद आते हो नरेंद्र... आखिर क्यों?"
वो कॉलेज की गलियां और प्यार का आगाज़
कहानी सात साल पहले शुरू हुई थी। पिंकी कॉलेज के दूसरे साल में थी। वह स्वभाव से थोड़ी शर्मीली और किताबों में खोई रहने वाली लड़की थी। नरेंद्र कॉलेज का वह लड़का था जिसे हर कोई पसंद करता था। वह न केवल पढ़ाई में अव्वल था, बल्कि उसकी आवाज़ में एक ऐसा जादू था कि जब वह गिटार लेकर बैठता, तो पूरा कैंपस थम जाता था।
उनकी पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई थी। पिंकी एक ऊँचे शेल्फ से किताब निकालने की कोशिश कर रही थी और अचानक नरेंद्र ने पीछे से आकर वह किताब उसे थमा दी। उसने मुस्कुराते हुए कहा था, "मुश्किलें हल करने के लिए दोस्त होते हैं, पिंकी।" वह हैरान रह गई थी कि नरेंद्र को उसका नाम पता है। वह मुलाकात दोस्ती में बदली और फिर न जाने कब दोस्ती ने मुहब्बत का लिबास पहन लिया।
नरेंद्र और पिंकी की जोड़ी पूरे कॉलेज में मशहूर थी। वे अक्सर कॉलेज के पीछे वाले बरगद के पेड़ के नीचे घंटों बैठे रहते। नरेंद्र कविताएं लिखता था और पिंकी उन्हें बड़ी तन्मयता से सुनती। उन दिनों दुनिया कितनी हसीन लगती थी। नरेंद्र अक्सर कहता, "पिंकी, अगर कभी हम अलग हो गए तो तुम क्या करोगी?" और पिंकी उसकी शर्ट की बाजू कसकर पकड़ लेती और कहती, "ऐसी बात मत करो, मैं तुम्हारे बिना साँस भी नहीं ले पाऊंगी।"
नरेंद्र हँस पड़ता और उसके माथे को चूमते हुए कहता, "पागल हो तुम! मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा। हम एक ऐसा घर बनाएंगे जहाँ सिर्फ हमारी यादें होंगी और ढेर सारा प्यार होगा।"
खुशियों का साया और नियति का क्रूर प्रहार
कॉलेज खत्म होने के बाद नरेंद्र को एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिल गई। पिंकी के घरवाले भी नरेंद्र को पसंद करने लगे थे। शादी की तारीख तय हो गई थी। हर तरफ खुशियाँ थीं, ढोलक की थाप थी और पिंकी के हाथों में नरेंद्र के नाम की मेहंदी रचने वाली थी। पिंकी अपनी शादी के जोड़े को लेकर बहुत उत्साहित थी। उसने सुर्ख लाल रंग का लहंगा चुना था, क्योंकि नरेंद्र को वह रंग बहुत भाता था।
लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। शादी से ठीक दस दिन पहले, नरेंद्र एक ज़रूरी काम से शहर से बाहर गया था। लौटते समय उसकी कार का भयानक एक्सीडेंट हो गया। जब पिंकी को फोन आया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बदहवास होकर अस्पताल की ओर भागी।
अस्पताल का वह सफेद गलियारा, फिनाइल की तीखी गंध और डॉक्टरों की चुप्पी पिंकी को ताउम्र याद रहने वाली थी। नरेंद्र आईसीयू में था। वह लड़ रहा था, अपनी आखिरी सांसों के लिए, अपनी पिंकी के लिए। जब पिंकी को उससे मिलने दिया गया, तो नरेंद्र ने मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं। उसके चेहरे पर पट्टियाँ थीं, पर आँखों में वही चमक थी। उसने पिंकी का हाथ थामने की कोशिश की और लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "पिंकी... तुम्हें... जीना होगा... मेरे बिना भी..."
पिंकी चीख-चीख कर रोने लगी, "नहीं नरेंद्र, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते! तुमने वादा किया था!" पर नरेंद्र की पकड़ ढीली होती गई। मशीन की 'टीं' वाली आवाज़ ने पिंकी के जीवन का संगीत हमेशा के लिए खामोश कर दिया। नरेंद्र उसे अकेला छोड़कर उस पार चला गया था जहाँ से कोई वापस नहीं आता।
शून्यता और भुलाने की असफल कोशिश
नरेंद्र के जाने के बाद पिंकी एक ज़िंदा लाश बन गई थी। शुरू के कुछ महीने तो वह किसी से बात तक नहीं करती थी। वह बस नरेंद्र के कमरे में बैठी रहती और उसकी टी-शर्ट को गले लगाकर रोती रहती। उसकी माँ उसे समझाती, "बेटी, जो चला गया वह वापस नहीं आता। तुम्हें आगे बढ़ना होगा।"
लोगों के दबाव और अपनी मानसिक स्थिति को संभालने के लिए पिंकी ने शहर छोड़ने का फैसला किया। वह दिल्ली चली गई और एक नई नौकरी शुरू की। उसने खुद से वादा किया कि वह नरेंद्र से जुड़ी हर याद को मिटा देगी। उसने उसका फोन नंबर ब्लॉक किया, उसकी तस्वीरें डिलीट कीं, और यहाँ तक कि उन गानों को सुनना भी बंद कर दिया जो नरेंद्र गाया करता था।
लेकिन यादें तो परछाई की तरह होती हैं। आप अंधेरे में भाग सकते हैं, पर उजाला होते ही वे फिर आपके साथ खड़ी हो जाती हैं। दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर चलते हुए भी उसे अचानक लगता कि पीछे से किसी ने उसे पुकारा है। वह पलटकर देखती, पर वहां कोई नहीं होता। कभी किसी अजनबी के परफ्यूम की खुशबू उसे नरेंद्र की याद दिला देती, तो कभी बारिश की बूंदें उसके ज़ख्मों को फिर से हरा कर देतीं।
वह जितना उसे भुलाना चाहती, वह उतना ही उसकी रगों में लहू बनकर दौड़ने लगता। रात के सन्नाटे में जब वह सोने की कोशिश करती, तो उसे नरेंद्र की वही आवाज़ सुनाई देती—"पागल हो तुम!"
वो पुरानी डायरी और भावनाओं का सैलाब
आज, सालों बाद, पिंकी ने वह पुराना संदूक खोला जो वह अपने साथ दिल्ली ले आई थी पर कभी खोला नहीं था। उसके हाथ काँप रहे थे। जैसे ही उसने ढक्कन हटाया, नरेंद्र की यादों की एक महक पूरे कमरे में फैल गई। पुरानी चिट्ठियां, कुछ सूखे हुए गुलाब और वह अधूरी डायरी जो नरेंद्र लिखता था।
पिंकी ने डायरी का आखिरी पन्ना खोला। वह तारीख नरेंद्र के एक्सीडेंट से एक दिन पहले की थी। नरेंद्र ने लिखा था:
"आज पिंकी के लिए लाल लहंगा देखा। वह उसमें परी जैसी लगेगी। पता नहीं क्यों, आज मन थोड़ा घबरा रहा है। ऐसा लगता है जैसे वक़्त बहुत कम है और बातें बहुत ज़्यादा। पिंकी, अगर कभी मैं तुम्हारे पास न रहूँ, तो उदास मत होना। मैं तुम्हारी मुस्कुराहट में, तुम्हारी यादों में और हर उस हवा के झोंके में रहूँगा जो तुम्हें छूकर गुज़रेगी। मुझे भूलने की कोशिश मत करना, क्योंकि मैं तो तुम्हारे भीतर ही बसता हूँ।"
पिंकी के सब्र का बांध टूट गया। वह डायरी को सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी सिसकियों से पूरा कमरा गूँज उठा। उसने महसूस किया कि वह कितनी बेवकूफ थी जो उसे भुलाने की कोशिश कर रही थी। नरेंद्र कोई बीता हुआ कल नहीं था, वह तो उसका वर्तमान था, उसकी हर धड़कन का हिस्सा था।
उसने महसूस किया कि प्रेम पाने का नाम नहीं, बल्कि उसे सहेज कर रखने का नाम है। नरेंद्र शारीरिक रूप से उसके पास नहीं था, पर उसकी आत्मा, उसके विचार और उसका प्यार हमेशा उसके साथ थे। वह उसे जितना भुलाने की कोशिश करती थी, वह उतना ही करीब आता था क्योंकि प्रेम कभी मरता नहीं।
एक नई शुरुआत: यादों के साथ
पिंकी उठी और उसने खिड़की के पास वाली दीवार पर फिर से नरेंद्र की वह तस्वीर लगा दी। अब उसके चेहरे पर आँसू तो थे, पर एक सुकून भरी मुस्कान भी थी। उसने तय किया कि वह अब नरेंद्र को भुलाने की कोशिश में अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करेगी। इसके बजाय, वह उसकी यादों को अपनी ताकत बनाएगी।
उसने नरेंद्र के नाम से एक छोटा सा संगीत स्कूल खोलने का फैसला किया, जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त में संगीत सिखाया जा सके। वह जानती थी कि नरेंद्र यही चाहता था। जब भी कोई बच्चा गिटार पर कोई धुन छेड़ता, पिंकी को लगता कि नरेंद्र वहीँ कहीं खड़ा मुस्कुरा रहा है।
आज भी जब बारिश होती है, पिंकी चाय लेकर खिड़की पर बैठती है। वह अब खुद से नहीं लड़ती। वह चुपचाप गुनगुनाती है—"तुम्हें जितना भुलाते हैं, तुम उतना ही याद आते हो।" और उसे महसूस होता है कि हवा का एक झोंका उसके बालों को सहलाकर गुज़रा है, जैसे नरेंद्र कह रहा हो, "मैंने कहा था न, मैं हमेशा तुम्हारे पास रहूँगा।"
प्रेम की यह कहानी भले ही अधूरी थी, पर इसकी गहराई और पवित्रता ने इसे अमर बना दिया था। पिंकी ने अब विरह को स्वीकार कर लिया था, क्योंकि उसने जान लिया था कि कुछ यादें मिटाने के लिए नहीं, बल्कि ताउम्र साथ निभाने के लिए होती हैं।
नरेंद्र और पिंकी की यह दास्तां उन सभी के लिए एक मरहम है जो किसी को खोने के गम में जी रहे हैं। यह याद दिलाती है कि जिसे हम दिल से चाहते हैं, वह कभी हमसे दूर नहीं जाता। वह बस हमारी यादों की एक गहरी परत में सिमट जाता है, और जब भी हम उसे भुलाने की कोशिश करते हैं, वह और भी शिद्दत के साथ हमारे सामने आ खड़ा होता है।
निष्कर्ष
शाम ढल चुकी थी, आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। पिंकी ने डायरी बंद की और शांति से अपनी आँखों को आराम दिया। अब उसे डर नहीं था, न ही कोई पछतावा। उसे पता था कि कल फिर सूरज उगेगा, फिर यादें आएंगी, और वह फिर से नरेंद्र के साथ अपनी दुनिया में मुस्कुराएगी। क्योंकि अंततः, सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता, वह बस रूप बदल लेता है—कभी आँसू बनकर, तो कभी एक मीठी याद बनकर।
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