मैं चाहता भी यही था कि वह बेवफा निकले: एक बलिदान की दास्तान


प्रेम की कोमल शुरुआत

पहाड़ों की गोद में बसे उस छोटे से शहर में, जहाँ सुबह की शुरुआत मंदिर की घंटियों और देवदार के वृक्षों से छनकर आती ताजी हवा से होती थी, वहाँ पिंकी और नरेंद्र के प्यार के चर्चे हर जुबान पर थे। पिंकी, जिसकी आँखों में सादगी और मुस्कान में एक अजीब सा सुकून था, और नरेंद्र, जो अपनी मेहनत और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। दोनों का प्यार कोई फिल्मी कहानी नहीं था, बल्कि वह उन पुराने किस्सों जैसा था जिनमें ठहराव और गहराई होती है।

नरेंद्र अक्सर पिंकी से कहता था, "पिंकी, अगर इस दुनिया में ईश्वर ने मेरे लिए कुछ सबसे खूबसूरत चुना है, तो वह तुम हो। मैं मरते दम तक तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूँगा।" पिंकी बस मुस्कुरा देती और अपना सिर उसके कंधे पर रख देती। उसे यकीन था कि उसकी दुनिया इसी कंधे पर सुरक्षित है।

खुशियों का छोटा सा संसार

उनकी शादी को अभी तीन साल ही हुए थे। एक छोटा सा घर, जिसमें चमेली की बेल खिड़की तक आती थी। नरेंद्र एक छोटी सी कंपनी में मैनेजर था और पिंकी घर संभालती थी। उनकी शामें अक्सर बालकनी में चाय पीते हुए और भविष्य के सपने बुनते हुए बीतती थीं। वे बच्चों के नाम तय करते, लंबी यात्राओं की योजना बनाते और एक-दूसरे की छोटी-छोटी आदतों पर हंसते थे।

लेकिन नियति को शायद यह खुशियाँ रास नहीं आ रही थीं। एक शाम, जब नरेंद्र ऑफिस से लौट रहा था, उसे अचानक चक्कर आया और वह सड़क किनारे गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ कुछ शुरुआती जाँच के बाद डॉक्टर ने जो कहा, उसने नरेंद्र की पूरी दुनिया हिला कर रख दी।

"नरेंद्र जी, आपके दिमाग में एक ऐसी गांठ है जो अब उस चरण में पहुँच चुकी है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं है। आपके पास शायद छह महीने, या उससे भी कम समय है।"

एक कठिन निर्णय

नरेंद्र उस रात घर लौटा, लेकिन वह पुराना नरेंद्र नहीं था। उसने पिंकी को खिलखिलाते हुए देखा, जो उसके पसंदीदा पकवान बना रही थी। उसकी आँखों में चमक थी और वह गुनगुना रही थी। नरेंद्र का दिल बैठ गया। उसने सोचा, 'अगर मैं इसे सच बता दूँ, तो यह हर पल मेरे साथ मरेगी। जब मैं चला जाऊँगा, तो यह ताउम्र मेरी विधवा बनकर, मेरी यादों के बोझ तले दबी रहेगी। यह अभी केवल पच्चीस साल की है। इसकी पूरी जिंदगी बाकी है।'

नरेंद्र ने उसी रात एक भयावह फैसला किया। उसने तय किया कि वह पिंकी की नजरों में खुद को इतना गिरा देगा कि वह उससे नफरत करने लगे। वह चाहता था कि उसकी मौत पर पिंकी रोए नहीं, बल्कि राहत की सांस ले। वह चाहता था कि पिंकी उसे अपनी जिंदगी से निकाल फेंके ताकि वह किसी और के साथ एक नई शुरुआत कर सके।

बदलाव की शुरुआत

अगले दिन से नरेंद्र का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह बिना किसी बात के पिंकी पर चिल्लाने लगा।

"क्या बनाया है यह? तुम्हें खाना बनाना भी नहीं आता? तीन साल से एक ही जैसा स्वाद!" उसने खाने की थाली एक तरफ सरका दी।

पिंकी हक्की-बक्की रह गई। "नरेंद्र, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है?" उसने उसके माथे पर हाथ रखने की कोशिश की, लेकिन नरेंद्र ने उसका हाथ झटक दिया।

"मेरी तबीयत को छोड़ो, अपनी फिक्र करो। मैं ऊब चुका हूँ इस रोज-रोज की जिंदगी से, इस छोटे से घर से और तुमसे भी!" नरेंद्र के शब्द जहर बुझे तीरों की तरह थे जो सीधे पिंकी के कलेजे में उतर रहे थे।

दिन बीतते गए और नरेंद्र की क्रूरता बढ़ती गई। वह देर रात शराब पीकर आने लगा (हालांकि वह शराब की बोतल में केवल पानी भरकर लाता था और सिर्फ नाटक करता था)। वह जानबूझकर फोन पर किसी 'अंजली' नाम की काल्पनिक लड़की से बातें करने का स्वांग रचता, ताकि पिंकी सुन सके।

नफरत की आग

पिंकी ने बहुत कोशिश की। वह रोई, उसने मिन्नतें कीं, उसने पूछा कि उससे क्या गलती हुई है। लेकिन नरेंद्र ने अपनी चुप्पी और अपने तानों से उसे तोड़ना जारी रखा।

एक रात, जब पिंकी ने उसे समझाने की कोशिश की, तो नरेंद्र ने चिल्लाकर कहा, "पिंकी, सच तो यह है कि मुझे अब तुममें कोई दिलचस्पी नहीं रही। मुझे कोई और मिल गई है। वह मुझसे प्यार करती है, वह तुम्हारी तरह पिछड़ी हुई नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तुम यह घर छोड़कर चली जाओ।"

पिंकी के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस इंसान को उसने अपना भगवान माना था, वह इतना गिर सकता है, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। उसकी आँखों के आँसू सूख गए और उनकी जगह एक ठंडी नफरत ने ले ली।

उसने अपना बैग पैक किया। दरवाजे पर खड़ी होकर उसने मुड़कर नरेंद्र को देखा, जो सोफे पर बैठकर बेपरवाही से टीवी देख रहा था। पिंकी ने रुंधे गले से कहा, "नरेंद्र, मैंने तुम्हें क्या नहीं दिया? मेरा प्यार इतना सस्ता था कि तुमने उसे किसी और के लिए बेच दिया? आज से मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं। मैं जा रही हूँ, और दुआ करती हूँ कि तुम्हारी शक्ल दोबारा कभी न देखूँ।"

जैसे ही दरवाजा बंद हुआ, नरेंद्र सोफे से नीचे गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। उसके सिर में तेज दर्द हो रहा था, लेकिन दिल का दर्द उससे कहीं ज्यादा था। उसने दीवार की तरफ देखकर धीरे से कहा, "मैं चाहता भी यही था कि तुम मुझे बेवफा समझो, पिंकी। बस अब तुम खुश रहना।"

अंतिम अध्याय: सत्य का अनावरण

पिंकी अपने मायके चली गई। उसने खुद को संभाला और एक स्कूल में नौकरी शुरू कर दी। उसकी नफरत ने उसे ताकत दी। कुछ महीनों बाद, उसे खबर मिली कि उसके बचपन का दोस्त, समीर, जो हमेशा से उसे पसंद करता था, वापस आ गया है। समीर ने पिंकी का साथ दिया, उसे उस सदमे से निकाला। धीरे-धीरे पिंकी के घाव भरने लगे।

इधर नरेंद्र की हालत बदतर होती जा रही थी। वह अस्पताल के एक साधारण से वार्ड में भर्ती था। उसका कोई अपना पास नहीं था, और उसने जानबूझकर किसी को खबर भी नहीं दी थी। वह बस हर दिन कैलेंडर पर तारीखें काट रहा था, यह सुनते हुए कि पिंकी अब खुश है। उसने अपने एक पुराने मित्र, जो डॉक्टर था, से वादा लिया था कि उसकी मौत के बाद ही यह सच पिंकी तक पहुँचे।

छह महीने बाद, नरेंद्र ने अपनी आखिरी सांस ली। उसके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी तस्वीर थी—पिंकी की। उसकी आँखों में एक अजीब सी संतुष्टि थी।

एक अधूरा सच

नरेंद्र के अंतिम संस्कार के दो दिन बाद, पिंकी के घर एक लिफाफा पहुँचा। उसमें नरेंद्र की मेडिकल रिपोर्ट्स थीं और एक छोटी सी डायरी। पिंकी ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था:

"मेरी प्यारी पिंकी, जब तुम यह पढ़ रही होगी, मैं तुम्हारे आसपास नहीं होऊँगा। मुझे माफ कर देना कि मैंने तुम्हें वह सब कहा जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। मैंने शराब नहीं पी थी, न ही कोई अंजली थी। सिर्फ मौत थी जो मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। मैं नहीं चाहता था कि मेरी मौत तुम्हें उम्र भर के लिए अंधेरे में धकेल दे। मैंने चाहा कि तुम मुझसे नफरत करो ताकि तुम फिर से प्यार कर सको। मैं चाहता भी यही था कि तुम मुझे बेवफा समझकर छोड़ दो, ताकि तुम्हारी वफादारी किसी ऐसे इंसान के काम आए जो तुम्हें लंबी जिंदगी दे सके। खुश रहना मेरी जान, यही मेरी आखिरी इच्छा है।"

पिंकी के हाथ से डायरी गिर गई। उसकी चीख निकल गई। वह उस बेवफाई के लिए रो रही थी जो असल में सबसे बड़ी वफादारी थी। वह नरेंद्र की नफरत को तो सह गई थी, लेकिन उसके इस महान बलिदान के बोझ ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया।

वह उसी शाम उस पहाड़ी पर गई जहाँ वे बैठकर सपने देखते थे। हवा तेज थी, और सूरज डूब रहा था। उसने आसमान की तरफ देखकर कहा, "नरेंद्र, तुमने जीत लिया। तुमने मुझे आजाद कर दिया, लेकिन तुमने मुझे एक ऐसी कैद में डाल दिया है जिससे मैं कभी बाहर नहीं निकल पाऊँगी। काश, तुमने मुझे अपने साथ मरने का हक दिया होता।"

पिंकी की आँखों से गिरते आँसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि कभी-कभी बेवफाई के पीछे भी उतना ही गहरा प्यार छिपा होता है, जितना कि वफा के पीछे। नरेंद्र चला गया था, लेकिन वह पिंकी के दिल में एक ऐसे देवता की तरह बस गया, जिसकी पूजा वह अब ताउम्र करने वाली थी।

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