प्यार कभी कुछ मांगता नहीं देने का नाम है प्यार: नरेंद्र की एक अद्भुत और मार्मिक कहानी


भूमिका: विडंबनाओं का घेरा

नरेंद्र के जीवन की विडंबना यह थी कि उसका दिल सोने का था, लेकिन उसकी किस्मत पत्थर की। वह जब भी किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता, नियति कुछ ऐसा खेल खेलती कि सामने वाले की आँखों में आँसू आ जाते। लोग उसे 'मनहूस' कहते, कोई उसे 'दुर्भाग्य का प्रतीक' मानता, तो कोई बस उससे कतराकर निकल जाता। लेकिन नरेंद्र? वह इन सबसे बेखबर बस प्यार बांटने की अपनी धुन में लगा रहता। उसने बचपन से ही एक बात सीखी थी—प्यार कभी कुछ मांगता नहीं, वह तो बस देने का नाम है।

रतनपुर जैसे छोटे से गाँव में पैदा हुए नरेंद्र की आँखों में हमेशा एक अजीब सी चमक रहती थी। वह दूसरों के दुखों को देखकर ऐसे तड़प उठता था जैसे वह दुख उसका अपना हो। लेकिन विडंबना देखिए, जिस हाथ से वह मरहम लगाने जाता, वही हाथ अनजाने में जख्म दे बैठता। यह उसकी कहानी है, जो हृदय को झंझोड़ कर रख देती है और प्रेम की एक ऐसी परिभाषा लिखती है जिसे दुनिया अक्सर भूल जाती है।

बचपन के वो दाग

नरेंद्र को आज भी वह दिन याद है जब वह मात्र दस साल का था। उसके पड़ोस में रहने वाली छोटी सी बच्ची, मिनी, का पालतू खरगोश बीमार था। मिनी रो रही थी। नरेंद्र से उसका दुख देखा नहीं गया। उसने सुना था कि जंगल की एक खास घास पीसकर पिलाने से जानवर ठीक हो जाते हैं। वह मीलों पैदल चलकर वह घास लाया, उसे घिसा और बड़े प्यार से खरगोश को पिलाया।

अगली सुबह, खरगोश मर गया। गाँव के हकीम ने कहा कि घास तो सही थी, लेकिन नरेंद्र ने उसे जिस पत्थर पर पीसा था, उस पर पहले किसी जहरीले कीड़े का अवशेष रहा होगा। मिनी ने नरेंद्र को धक्का देते हुए कहा था, "तुम बहुत बुरे हो! तुमने मेरे खरगोश को मार डाला!" वह पहली बार था जब नरेंद्र की निस्वार्थ कोशिश ने उसे अपराधी बना दिया था। नरेंद्र रोता रहा, सफाई देने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।

किशोरावस्था और दोस्ती का इम्तिहान

वक्त बीता, लेकिन नरेंद्र की किस्मत नहीं बदली। स्कूल में उसका सबसे अच्छा दोस्त था—अमित। अमित पढ़ाई में कमजोर था और उसे डर था कि वह फेल हो जाएगा। नरेंद्र ने रात-रात भर जागकर अमित के लिए नोट्स बनाए, उसे अपनी सबसे प्रिय किताबें दीं। परीक्षा के दिन, अमित का पेन खराब हो गया। नरेंद्र ने तुरंत अपना पेन उसे थमा दिया और खुद एक पुराने, रुक-रुक कर चलने वाले पेन से लिखने लगा।

परिणाम आया, तो पता चला कि अमित के पेन की स्याही बीच में ही फैल गई थी जिससे उसकी पूरी उत्तर पुस्तिका खराब हो गई और वह फेल हो गया। नरेंद्र, जिसने खुद के लिए खराब पेन रखा था, वह पास हो गया। अमित ने नरेंद्र पर आरोप लगाया, "तुमने जानबूझकर मुझे वह खराब पेन दिया ताकि तुम क्लास में अव्वल आ सको और मैं पीछे रह जाऊँ!"

"दुनिया अक्सर इरादों को नहीं, परिणामों को देखती है। नरेंद्र के इरादे पवित्र थे, पर परिणाम हमेशा उसके विरुद्ध खड़े मिलते थे।"

कॉलेज की गलियां और पहला प्यार

नरेंद्र जब कॉलेज पहुँचा, तो उसने सोचा कि शायद अब उसकी किस्मत करवट लेगी। वहाँ उसकी मुलाकात नेहा से हुई। नेहा शांत, सुशील और कला प्रेमी थी। नरेंद्र को उससे पहली नजर में प्यार हो गया। लेकिन यह वह प्यार नहीं था जो अधिकार जताता है। नरेंद्र का प्यार तो वह था जो नेहा की खुशी में ही अपनी दुनिया देखता था।

नेहा एक बार एक पेंटिंग प्रतियोगिता में भाग ले रही थी। वह रात भर जागकर अपनी कृति तैयार कर रही थी। नरेंद्र ने देखा कि नेहा थक गई है और उसे कॉफी की जरूरत है। वह चुपचाप उसके लिए कॉफी बनाने गया। जब वह वापस लौटा, तो उसका पैर एक बिजली के तार से उलझ गया और पूरी की पूरी कॉफी नेहा की हफ्तों की मेहनत, उस पेंटिंग पर गिर गई।

नेहा की आँखों में गुस्सा और नफरत थी। उसने चिल्लाकर कहा, "नरेंद्र, तुम मेरी जिंदगी में आए ही क्यों? तुम जहाँ जाते हो, वहाँ सिर्फ बर्बादी लाते हो! मुझे तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना!" नरेंद्र का दिल टूटकर बिखर गया। वह उसे बताना चाहता था कि वह तो बस उसकी थकान मिटाना चाहता था, लेकिन शब्द उसके गले में ही फंस कर रह गए।

अपमान का वो घूँट

नेहा के उस अपमान के बाद नरेंद्र शहर चला गया। उसने मेहनत की और एक छोटी सी नौकरी पा ली। लेकिन वहाँ भी उसकी 'दुर्भाग्य' वाली साया ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसने अपने बॉस की मदद करने के लिए एक फाइल को सुधारा, जिसमें बॉस ने गलती की थी। नरेंद्र चाहता था कि मीटिंग में बॉस की बेइज्जती न हो। लेकिन अनजाने में उसने वह फाइल ही बदल दी जो किसी और प्रोजेक्ट की थी। बॉस को भारी नुकसान हुआ और नरेंद्र को सार्वजनिक रूप से जलील करके नौकरी से निकाल दिया गया।

हर कोई उसे 'धोखेबाज' और 'बदकिस्मत' कहने लगा। जहाँ-जहाँ उसने प्यार और समर्पण दिखाया, बदले में उसे केवल तिरस्कार और अपमान मिला। वह रातों को अकेले बैठकर सोचता—"क्या अच्छा करना इतना बुरा है? क्या मेरी किस्मत में सिर्फ दूसरों को रुलाना ही लिखा है?"

अंतिम त्याग: प्यार की पराकाष्ठा

सालों बाद, नरेंद्र को पता चला कि उसका वही पुराना दोस्त अमित, जो कभी उसे अपना दुश्मन मान बैठा था, अब एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। अमित की आर्थिक स्थिति खराब थी और उसे किडनी ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत थी। नेहा, जिससे नरेंद्र ने कभी बेपनाह मोहब्बत की थी, अब अमित की पत्नी थी। यह जानकर नरेंद्र का हृदय कांप उठा। उसे पता चला कि नेहा अपने पति को बचाने के लिए दर-दर भटक रही है, लेकिन कोई मदद नहीं मिल रही।

नरेंद्र ने फैसला किया कि वह मदद करेगा। लेकिन वह जानता था कि अगर वह सामने गया, तो वे उसका अपमान करेंगे या उसकी मदद ठुकरा देंगे। उसने एक अज्ञात दानदाता बनकर अपनी एक किडनी देने का फैसला किया। उसने अस्पताल के सारे खर्च चुपचाप वहन किए।

ऑपरेशन सफल रहा। अमित ठीक हो गया। नेहा की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसे लगा कि भगवान ने किसी फरिश्ते को भेजा है। वह उस 'अज्ञात फरिश्ते' से मिलना चाहती थी। डॉक्टर ने नरेंद्र से कहा, "वे आपसे मिलना चाहते हैं, नरेंद्र। क्या आप नहीं चाहेंगे कि वे जानें कि आपने उनके लिए क्या किया है?"

नरेंद्र ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिलाया। "नहीं डॉक्टर साहब। अगर उन्हें पता चला कि यह मैंने किया है, तो शायद वे इस अहसान के बोझ तले दब जाएंगे या फिर उन्हें लगेगा कि इसमें भी मेरा कोई स्वार्थ है। मेरी किस्मत ऐसी है कि अगर मैं सामने आया, तो उनकी यह खुशी भी शायद किसी न किसी रूप में दुख में बदल जाए। उन्हें खुश रहने दीजिए। मेरा प्यार तो बस देने का नाम है, लेने का नहीं।"

अंत: एक मौन विदाई

नरेंद्र अस्पताल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गया। उसके शरीर में टांकों का दर्द था, लेकिन मन में एक अजीब सी शांति थी। उसने पहली बार किसी को रुलाया नहीं था, बल्कि अपनी गुमनामी की कीमत पर किसी की दुनिया उजाड़ने से बचा ली थी।

वह उसी रतनपुर गाँव की ओर लौट चला, जहाँ से उसकी कहानी शुरू हुई थी। अब उसके पास न कोई रिश्ता था, न कोई धन-दौलत, और न ही कोई अपना कहने वाला। लेकिन उसके पास वह सुकून था जो केवल निस्वार्थ प्रेम करने वालों को ही मिलता है। वह समझ गया था कि दुनिया उसे चाहे जो कहे, लेकिन ईश्वर के दरबार में उसकी नीयत साफ थी।

नरेंद्र की कहानी हमें सिखाती है कि प्यार वह नहीं जो बदले में सम्मान या पहचान मांगे। प्यार तो वह मोमबत्ती है जो खुद पिघलकर दूसरों को रोशनी देती है। भले ही दुनिया नरेंद्र को एक 'असफल' व्यक्ति माने, लेकिन मानवता के इतिहास में वह एक ऐसा महानायक था, जिसने अपमान के जहर को पीकर भी केवल प्यार का अमृत ही बांटा।

उसकी आँखों में आज भी वही चमक थी, लेकिन अब उसमें कोई शिकायत नहीं थी। उसने सच ही कहा था—प्यार कभी कुछ मांगता नहीं, देने का नाम है प्यार। और नरेंद्र ने अपना सब कुछ दे दिया था, यहाँ तक कि अपनी पहचान भी।

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