ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह: एक परिचय
भारतीय संगीत जगत में जगजीत सिंह एक ऐसा नाम है, जिन्होंने ग़ज़ल जैसे शास्त्रीय और जटिल गायन को आम आदमी के दिल तक पहुँचाया। उन्हें 'ग़ज़ल सम्राट' के रूप में जाना जाता है। जगजीत सिंह ने न केवल अपने प्राइवेट एलबम्स के जरिए दुनिया को दीवाना बनाया, बल्कि बॉलीवुड फिल्मों और टेलीविजन के सुनहरे दौर में भी अपनी आवाज़ का वो जादू बिखेरा जो आज भी संगीत प्रेमियों के कानों में रस घोलता है।
उनका जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। उनका असली नाम जगमोहन सिंह धीमान था, लेकिन उनके पिता ने एक साधु की सलाह पर उनका नाम बदलकर जगजीत रख दिया। संगीत की शुरुआती तालीम उन्होंने पंडित छगनलाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से ली। 1965 में वे अपनी किस्मत आज़माने मुंबई आए और वहां से उनके उस सफर की शुरुआत हुई जिसने भारतीय सुगम संगीत की परिभाषा ही बदल दी।
80 का दशक: बॉलीवुड में ग़ज़ल क्रांति की शुरुआत
1980 के दशक की शुरुआत में जब बॉलीवुड संगीत डिस्को और तेज़ धुनों की ओर बढ़ रहा था, तब जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज़ और रूहानी धुनों से फिल्मों में एक नया अध्याय जोड़ा।
1. प्रेम गीत (1981): 'होठों से छू लो तुम'
फिल्म 'प्रेम गीत' जगजीत सिंह के फिल्मी करियर का एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने न केवल अपनी आवाज़ दी, बल्कि संगीत भी तैयार किया। इस फिल्म का गाना
"होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो..."न केवल उस दौर का सबसे बड़ा हिट था, बल्कि आज भी यह प्रेम की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त गीत माना जाता है। इस गाने ने जगजीत सिंह को घर-घर में पहचान दिलाई।
2. अर्थ (1982): भावनाओं का समंदर
महेश भट्ट की फिल्म 'अर्थ' जगजीत सिंह और उनकी पत्नी चित्रा सिंह के करियर की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है। इस फिल्म के गाने सिर्फ गाने नहीं थे, बल्कि वे कहानी की भावनाओं को बयां करते थे। 'झुकी झुकी सी नज़र', 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', 'कोई ये कैसे बताए' और 'तेरे खुशबू में बसे खत' जैसे गीतों ने फिल्म को एक अलग ऊंचाई पर पहुँचाया। इन गानों के बोल कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे, और जगजीत सिंह की आवाज़ ने उन्हें अमर कर दिया।
3. साथ-साथ (1982): मध्यम वर्ग की धड़कन
'साथ-साथ' फिल्म का संगीत भी जगजीत और चित्रा सिंह की जोड़ी ने तैयार किया था। इसके गाने 'तुमको देखा तो ये ख्याल आया', 'ये तेरा घर ये मेरा घर' और 'प्यार मुझसे जो किया तुमने' आज भी उतने ही ताज़ा लगते हैं। जावेद अख्तर के बोलों और जगजीत सिंह की सादगी भरी गायकी ने इस फिल्म के संगीत को कालजयी बना दिया।
टेलीविजन की दुनिया और 'मिर्ज़ा ग़ालिब' का पुनर्जन्म
जगजीत सिंह का योगदान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं था। टेलीविजन के पर्दे पर उन्होंने जो काम किया, वह संगीत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।
मिर्ज़ा ग़ालिब (1988)
गुलज़ार द्वारा निर्देशित टीवी सीरियल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' जगजीत सिंह के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इस सीरियल के माध्यम से उन्होंने 19वीं सदी के महान कवि मिर्ज़ा ग़ालिब की मुश्किल उर्दू शायरी को आम जनता के लिए सुगम बना दिया। 'दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है', 'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी', 'आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक' जैसी ग़ज़लों ने लोगों को ग़ालिब का दीवाना बना दिया। इस काम के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
कहकशां (1991)
'मिर्ज़ा ग़ालिब' की सफलता के बाद जगजीत सिंह ने 'कहकशां' सीरियल में अपनी आवाज़ दी, जो अली सरदार जाफ़री द्वारा निर्मित था। इसमें उन्होंने जोश मलीहाबादी, मज़ाज़ लखनवी और फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे शायरों की रचनाओं को स्वरबद्ध किया। यह सीरियल भी उर्दू अदब और संगीत के संगम का बेहतरीन उदाहरण था।
90 के दशक से 2000 तक: बदलती फिल्मों में वही रूहानियत
90 के दशक में जहाँ संगीत का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका था, जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू बरकरार रहा। उन्होंने कई बड़ी फिल्मों में अपनी आवाज़ से रूहानी गहराई भरी।
4. सरफ़रोश (1999): 'होशवालों को खबर क्या'
आमिर खान अभिनीत फिल्म 'सरफ़रोश' में जगजीत सिंह ने एक पाकिस्तानी ग़ज़ल गायक (गुलफाम हसन) की भूमिका के लिए अपनी आवाज़ दी। गाना
"होशवालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजिए फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है..."निदा फ़ाज़ली के बोलों पर आधारित था और यह उस साल का सबसे लोकप्रिय गाना बना। यह गाना आज भी युवाओं के बीच उतना ही लोकप्रिय है।
5. दुश्मन (1998): 'चिट्ठी ना कोई संदेश'
फिल्म 'दुश्मन' का यह गीत जगजीत सिंह के सबसे भावनात्मक गीतों में से एक है। 1990 में अपने इकलौते बेटे विवेक सिंह को एक कार दुर्घटना में खोने के बाद, जगजीत सिंह की आवाज़ में एक गहरा दर्द समा गया था। जब उन्होंने 'चिट्ठी ना कोई संदेश' गाया, तो ऐसा लगा मानो वो अपने बेटे को याद कर रहे हों। इस गाने ने हर उस इंसान की आँखों को नम कर दिया था।
6. तुम बिन (2001): 'कोई फरियाद'
नई सदी की शुरुआत में फिल्म 'तुम बिन' आई, जिसमें जगजीत सिंह ने 'कोई फरियाद' ग़ज़ल गाई। फ़ैज़ अनवर के लिखे इस गीत ने साबित कर दिया कि जगजीत सिंह की आवाज़ का जादू कभी कम नहीं हो सकता। इस ग़ज़ल की लोकप्रियता इतनी थी कि साल 2016 में आई फिल्म 'तुम बिन 2' में भी उनकी आवाज़ का मूल हिस्सा इस्तेमाल किया गया।
क्षेत्रीय सिनेमा और अन्य महत्वपूर्ण योगदान
जगजीत सिंह ने केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि पंजाबी, बंगाली और गुजराती सिनेमा में भी अपनी आवाज़ दी। पंजाबी फिल्मों में उनके 'टप्पे' और 'लोकगीत' काफी प्रसिद्ध रहे। फिल्म 'शहीद उधम सिंह' और 'पिंजर' में उनके द्वारा गाए गए गीतों ने इतिहास की परतों को संगीत के जरिए जीवंत कर दिया। फिल्म 'पिंजर' का गाना 'हाथ छूटे भी तो' गुलज़ार के साथ उनके बेहतरीन तालमेल का एक और प्रमाण था।
टीवी सीरियल्स के टाइटल सॉन्ग्स
- नीम का पेड़: दूरदर्शन के इस प्रसिद्ध धारावाहिक का शीर्षक गीत जगजीत सिंह की आवाज़ में एक अलग ही गहराई लिए हुए था।
- सैलाब: इस सीरियल का गाना 'बीत गए दिन' आज भी लोगों को पुरानी यादों में ले जाता है।
- हैलो ज़िंदगी: इस शो के लिए भी उन्होंने अपनी जादुई आवाज़ दी।
जगजीत सिंह के संगीत की विशेषता
जगजीत सिंह की आवाज़ और संगीत की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी थी। उन्होंने ग़ज़ल में भारी भरकम साज़ों के बजाय गिटार, कीबोर्ड और वायलिन जैसे आधुनिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया ताकि युवा पीढ़ी भी इससे जुड़ सके। उनकी गायकी को 'बोल-प्रधान' कहा जाता है, जहाँ शब्दों के अर्थ और उनकी भावना को संगीत से ऊपर रखा जाता है।
अंतिम दौर और विरासत
जगजीत सिंह ने अपने अंतिम समय तक संगीत साधना जारी रखी। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को भी अपनी आवाज़ दी (एल्बम 'नई दिशा' और 'संवेदना')। 10 अक्टूबर 2011 को इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हमारे बीच मौजूद है।
चाहे वो 'जॉगर्स पार्क' का 'बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल' हो या 'वीर-ज़ारा' के कुछ अंश, जगजीत सिंह ने हर जगह अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। उनकी फिल्में और टीवी सीरियल्स के गीत न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि वे मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा आईना हैं जिसमें हर कोई अपनी खुशी और गम को देख सकता है।
निष्कर्ष
जगजीत सिंह की संगीतमय यात्रा यह सिखाती है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का सुकून है। उन्होंने अपनी आवाज़ से न केवल फिल्मों को सुपरहिट बनाया, बल्कि भारतीय संस्कृति और उर्दू शायरी को भी जीवित रखा। आज भी जब हम तन्हा होते हैं या किसी पुरानी याद में डूबे होते हैं, तो जगजीत सिंह की आवाज़ ही सबसे अच्छा सहारा बनती है।
Post a Comment