शहर का कोलाहल और नरेंद्र का सन्नाटा
शहर की रफ़्तार अपनी जगह थी, लेकिन नरेंद्र के फ्लैट की दीवारों के भीतर एक अलग ही दुनिया बसती थी—ठहरी हुई और बेआवाज़। नरेंद्र, जो अब साठ के पड़ाव को छू रहे थे, अपने लिविंग रूम की बालकनी में बैठकर नीचे सड़क पर चलते लोगों को देखा करते थे। शाम का वक्त था, सूरज ढल रहा था और आसमान में नारंगी और बैंगनी रंगों की लुका-छिपी चल रही थी। नीचे पार्क में युवाओं का एक समूह ज़ोर-ज़ोर से हंस रहा था। उनकी हंसी की गूंज नरेंद्र की बालकनी तक पहुँच रही थी।
तभी पड़ोस में रहने वाले खन्ना जी अपनी पोती के साथ वहाँ से गुज़रे। उन्होंने ऊपर देखा और हाथ हिलाकर अभिवादन किया। नरेंद्र ने भी औपचारिकता में हाथ हिला दिया। खन्ना जी ने नीचे से ही चिल्लाकर पूछा, "अरे नरेंद्र भाई, आज पार्क नहीं आए? हमारे पुराने दोस्तों की मंडली आपका इंतज़ार कर रही थी!" नरेंद्र के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई। उन्होंने धीरे से कहा, "बस खन्ना जी, आज मन थोड़ा भारी था। और वैसे भी, आपके पास तो पुराने दोस्त हैं, बस हमारे पास ही कोई नहीं है।"
खन्ना जी को शायद उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी या फिर उन्होंने अनसुना कर दिया, वे अपनी पोती का हाथ थामे आगे बढ़ गए। नरेंद्र वहीं खड़े रहे, उनकी आँखें फिर से उस हंसी-मज़ाक करते युवाओं के झुंड पर टिक गईं। उनके मन में एक सवाल बार-बार कौंध रहा था—क्या सच में उनके पास कोई दोस्त नहीं था? या फिर उन्होंने कभी किसी को अपना दोस्त बनने ही नहीं दिया?
सफलता की दौड़ और पीछे छूटते रिश्ते
नरेंद्र का अतीत किसी फिल्म की रफ़्तार जैसा था। वे एक सफल कॉर्पोरेट मैनेजर रहे थे। दिल्ली के सबसे पॉश इलाकों में उनका दफ्तर था और उनकी उंगलियों पर सैकड़ों लोग काम करते थे। उन दिनों नरेंद्र के फोन की घंटी कभी शांत नहीं होती थी। हर रोज़ शाम को किसी न किसी पार्टी का निमंत्रण होता था। लोग उनसे हाथ मिलाने के लिए कतार में खड़े रहते थे।
"जब जेब भरी होती है और ओहदा बड़ा होता है, तो पूरी दुनिया आपकी दोस्त बन जाती है। लेकिन वह दोस्ती इंसान से नहीं, उस कुर्सी से होती है जिस पर आप बैठे होते हैं।"
नरेंद्र को याद आया वह दौर, जब उनके पास अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के लिए भी समय नहीं था। उनके दोस्त भी वही थे जो उनके व्यवसाय से जुड़े थे। वे साथ में गोल्फ खेलते, महंगी व्हिस्की पीते और केवल मुनाफे की बातें करते। उस समय उन्हें लगता था कि यही 'सोशल लाइफ' है। लेकिन जैसे ही रिटायरमेंट की तारीख नज़दीक आई, वे फोन कॉल्स कम होने लगे। जिस दिन उन्होंने दफ्तर की चाबियाँ सौंपी, उसी दिन से उनके उन 'दोस्तों' ने भी किनारा करना शुरू कर दिया।
उनकी पत्नी, सरला, अक्सर उनसे कहती थीं, "नरेंद्र, काम के बाहर भी कुछ रिश्ते कमाओ। ये फाइलें कभी आपके बीमार होने पर सिरहाने नहीं बैठेंगी।" नरेंद्र तब हंसकर टाल देते थे, पर आज सरला की कमी उन्हें बुरी तरह खल रही थी। तीन साल पहले एक लंबी बीमारी के बाद सरला उन्हें छोड़ गईं। बेटा विदेश में सेटल हो गया। अब इस बड़े से फ्लैट में नरेंद्र और उनकी खामोशी के सिवा कोई तीसरा नहीं था।
एक पुरानी डायरी और अधूरे नाम
रात के सन्नाटे में, जब नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी, नरेंद्र ने अपनी पुरानी अलमारी खोली। धूल भरी परतों के नीचे उन्हें अपनी कॉलेज की एक पुरानी डायरी मिली। पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन लिखावट अब भी पहचानी जा सकती थी। उसमें कुछ नाम लिखे थे—अविनाश, सुमित, रंजीत।
रंजीत... नरेंद्र का सबसे करीबी दोस्त। हॉस्टल के दिनों में वे एक ही थाली में खाना खाते थे। रंजीत गरीब परिवार से था, लेकिन उसका दिल सोने का था। जब नरेंद्र की नौकरी पहली बार लगी थी, तो रंजीत ने अपनी पहली कमाई से उसे एक घड़ी तोहफे में दी थी। लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते गए, उन्हें रंजीत की सादगी 'बैकवर्ड' लगने लगी। एक दिन मामूली सी बहस हुई और नरेंद्र ने अहंकार में कह दिया, "तुम्हारे और मेरे स्टैंडर्ड में अब बहुत फर्क है, रंजीत।"
उस दिन के बाद रंजीत कभी वापस नहीं आया। आज नरेंद्र ने अपनी कलाई पर बंधी उस पुरानी घड़ी को देखा, जो सालों से बंद पड़ी थी। उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने केवल रंजीत को नहीं खोया था, बल्कि अपनी सादगी और उस मासूमियत को भी खो दिया था जो दोस्ती की बुनियाद होती है।
चाय की दुकान और एक नया नज़रिया
अगली सुबह, नरेंद्र ने तय किया कि वे घर में बंद नहीं रहेंगे। वे पास के एक छोटे से चाय के खोखे पर गए, जहाँ अक्सर ऑटो ड्राइवर और मज़दूर चाय पीने आते थे। वहाँ की बेंच पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जो फटे हुए कपड़े पहने हुए था लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
नरेंद्र उसके पास जाकर बैठ गए। चाय वाले ने कड़क अदरक वाली चाय दी। बगल में बैठे उस बूढ़े आदमी ने नरेंद्र की तरफ देखा और मुस्कुराकर बोला, "साहब, आज पहली बार इस तरफ आए?" नरेंद्र ने सिर हिलाया। बातों-बातों में पता चला कि उस बूढ़े का नाम रामू है। रामू के पास रहने को पक्का घर नहीं था, पर उसके पास सुनाने को हज़ारों कहानियाँ थीं।
रामू ने कहा, "साहब, इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जिनके पास बहुत कुछ होता है पर साझा करने वाला कोई नहीं, और दूसरे वो जिनके पास कुछ नहीं होता पर बाँटने के लिए पूरा जहान होता है।" नरेंद्र को लगा जैसे रामू ने उनके दिल की नस पर हाथ रख दिया हो।
दोस्ती की नई परिभाषा
दिन बीतते गए। नरेंद्र अब रोज़ उस चाय की दुकान पर जाने लगे। उन्होंने जाना कि दोस्ती के लिए हमउम्र होना या एक जैसा बैंक बैलेंस होना ज़रूरी नहीं है। उन्होंने पार्क में उन युवाओं से बात करना शुरू किया जिन्हें वे पहले केवल दूर से देखते थे। उन्होंने पाया कि वे लड़के भी अपनी ज़िंदगी के संघर्षों में उलझे हुए थे और उन्हें बस कोई ऐसा चाहिए था जो उनकी बात सुन सके।
एक दिन, नरेंद्र ने मोहल्ले के बच्चों के लिए अपनी बालकनी से कहानियाँ सुनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनके घर की खामोशी बच्चों के शोर-शराबे में बदलने लगी। जो नरेंद्र कभी अकेलेपन का रोना रोते थे, आज उनके पास मिलने वालों का तांता लगा रहता था।
खन्ना जी एक दिन फिर मिले। उन्होंने देखा कि नरेंद्र कुछ बच्चों के साथ कैरम खेल रहे हैं। खन्ना जी ने मज़ाक में कहा, "क्यों नरेंद्र भाई, अब तो आपके पास बहुत दोस्त हो गए हैं?" नरेंद्र ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हाँ खन्ना जी, मुझे समझ आ गया कि दोस्त होते नहीं हैं, उन्हें बनाना पड़ता है। और सबसे ज़रूरी बात, दोस्त वह नहीं होता जो आपकी सफलता में साथ दे, बल्कि वह होता है जो आपकी खामोशी को भी पढ़ ले।"
उपसंहार: एकांत से आत्मीयता तक
नरेंद्र की कहानी हमें सिखाती है कि इंसान का सबसे बड़ा धन पैसा या रुतबा नहीं, बल्कि वे रिश्ते हैं जो वह अपनी निस्वार्थ भावना से कमाता है। 'आपके पास दोस्त हैं, हमारे पास नहीं'—यह कहना एक शिकायत हो सकती है, लेकिन उस शिकायत को दूर करना स्वयं हमारे हाथ में होता है।
नरेंद्र ने अपनी अधूरी कहानी को खुद पूरा किया। उन्होंने रंजीत को ढूँढने की कोशिश की और अंततः उसे एक छोटे से गाँव में पा लिया। जब दोनों पुराने दोस्त गले मिले, तो सालों की जमी बर्फ एक पल में पिघल गई। नरेंद्र को समझ आ गया कि ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर आपके पास कितनी गाड़ियाँ हैं, यह मायने नहीं रखता; मायने यह रखता है कि आपकी अर्थी को कांधा देने के लिए कितने सच्चे दिल साथ खड़े होंगे।
आज नरेंद्र अकेले नहीं हैं। उनके पास यादें भी हैं और यार भी। और सबसे बढ़कर, उनके पास वह सुकून है जो केवल दूसरों के साथ जुड़ने से मिलता है।
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