जब भी चाहा बस केवल तुम्हारी मुस्कुराहट ही चाही


अनकही खामोशी और एक अटूट कोशिश

शहर की शोर-शराबे वाली गलियों से दूर, कॉलेज के उस पुराने बरगद के पेड़ के नीचे समीर हमेशा अपनी डायरी लिए बैठा रहता था। लेकिन उसका ध्यान डायरी के पन्नों पर कम और सामने लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरती मीरा पर ज़्यादा होता था। मीरा—जो अपनी गंभीर आँखों और हमेशा शांत रहने वाले चेहरे के लिए जानी जाती थी। समीर और मीरा दोस्त थे, पर उनकी दोस्ती में एक अजीब सा फासला था, जिसे समीर हर रोज़ पाटने की कोशिश करता था।

समीर का एक ही मकसद था, मीरा के चेहरे पर एक सच्ची मुस्कुराहट देखना। उसने न जाने कितनी बार चुटकुले सुनाए, बेवकूफी भरी हरकतें कीं, और यहाँ तक कि कॉलेज के एनुअल फंक्शन में एक फनी डांस भी किया, सिर्फ इसलिए कि शायद मीरा उसे देखकर मुस्कुरा दे। पर मीरा? वह बस एक हल्की सी सिर की जुंबिश देती और अपनी किताबों में खो जाती।

कोशिशों का सिलसिला

एक दोपहर, जब धूप अपनी चरम सीमा पर थी, समीर ने मीरा के सामने एक छोटी सी कागज़ की नाव रखी। मीरा ने उसे देखा और समीर की ओर सवालिया नज़रों से ताका।

"समीर, बारिश तो हो नहीं रही, फिर यह नाव क्यों?" मीरा ने अपनी सपाट आवाज़ में पूछा।

समीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "ज़रूरी नहीं कि नाव चलाने के लिए बारिश हो मीरा, कभी-कभी यादों के दरिया में भी नाव उतारी जा सकती है। बस एक बार मुस्कुरा दो, तो समझूँगा मेरी नाव किनारे लग गई।"

मीरा ने एक ठंडी आह भरी और फिर से अपनी फाइल के पन्ने पलटने लगी। समीर को बुरा नहीं लगा, उसे तो अब इस इनकार की आदत हो गई थी। वह जानता था कि मीरा के भीतर कहीं न कहीं कोई घाव है जो उसे खिलखिलाने से रोकता है। वह अक्सर सोचता कि क्या कभी वह उस दीवार को तोड़ पाएगा जिसे मीरा ने अपने चारों ओर बना रखा था?

बचपन की वह धुंधली याद

जैसे-जैसे वक्त बीता, समीर और मीरा की दोस्ती और गहरी होती गई। एक शाम, कॉलेज की छत पर बैठे हुए, समीर ने हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया। "मीरा, तुम कभी दिल खोलकर हँसती क्यों नहीं? क्या तुम्हें खुशी से डर लगता है?"

मीरा ने दूर क्षितिज पर ढलते सूरज को देखते हुए कहा, "समीर, हँसना सबके लिए आसान नहीं होता। मेरे घर में मुस्कुराहटों पर एक अदृश्य पाबंदी थी। मेरी माँ हमेशा कहती थी कि जो ज़्यादा हँसता है, उसे बाद में उतना ही रोना पड़ता है। और फिर जब वह हमें छोड़कर चली गईं, तो मुझे लगा कि उनकी बात सच थी। तब से मैंने मुस्कुराना जैसे छोड़ ही दिया।"

समीर का दिल बैठ गया। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक मुस्कान के पीछे इतनी गहरी उदासी छुपी हो सकती है। उसने मीरा का हाथ धीरे से थामा और कहा, "तुम्हारी माँ ने शायद वह डर के मारे कहा होगा, पर यकीन मानो, तुम्हारी एक मुस्कुराहट इस दुनिया को थोड़ा और खूबसूरत बना सकती है। मैं तब तक कोशिश करता रहूँगा, जब तक तुम खुद से नहीं मुस्कुरातीं।"

तकरार और दूरियाँ

दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए। समीर की कोशिशें जारी रहीं, लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उनकी दोस्ती की नींव हिला दी। समीर ने मीरा के जन्मदिन पर पूरे कैंटीन को गुब्बारों से भर दिया और एक जोकर को बुलाया ताकि वह मीरा को हँसा सके।

जब मीरा वहाँ पहुँची, तो सब उसे देखकर तालियाँ बजाने लगे। लेकिन मीरा को यह सब पसंद नहीं आया। उसे लगा कि समीर उसकी भावनाओं का मज़ाक उड़ा रहा है। वह सबके सामने समीर पर चिल्ला पड़ी।

"समीर! बंद करो यह सब! तुम्हें क्या लगता है कि तुम मुझे ज़बरदस्ती हँसा दोगे? तुम्हें मेरी खामोशी से इतनी चिढ़ क्यों है? अगर तुम्हें मेरी मुस्कुराहट इतनी ही पसंद है, तो किसी और दोस्त को ढूँढ लो जो हर वक्त हँसती रहे!"

मीरा वहाँ से रोते हुए भाग गई। समीर वहीं खड़ा रह गया, हाथ में एक छोटा सा तोहफा लिए। उस दिन के बाद, उनके बीच बातचीत बंद हो गई। समीर ने कोशिश करना छोड़ दिया। उसे लगा कि शायद वह मीरा को समझने में गलती कर रहा था।

अहसास की घड़ी

कॉलेज खत्म होने वाला था। सबको अपनी-अपनी मंज़िल की तलाश थी। समीर ने शहर छोड़ने का फैसला कर लिया था। जाने से एक दिन पहले, वह उसी पुराने बरगद के नीचे बैठा था, जहाँ से उनकी दोस्ती शुरू हुई थी।

अचानक, उसे महसूस हुआ कि कोई उसके पीछे खड़ा है। उसने मुड़कर देखा—वह मीरा थी। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी।

"समीर, क्या तुम सच में जा रहे हो?" मीरा ने धीमी आवाज़ में पूछा।

समीर ने नज़रें झुका लीं, "हाँ मीरा, शायद मेरा यहाँ काम खत्म हो गया है। मैंने हमेशा चाहा कि तुम खुश रहो, पर शायद मेरी मौजूदगी ही तुम्हें परेशान करती है।"

मीरा ने आगे बढ़कर समीर का हाथ पकड़ा। "तुम गलत हो समीर। इन पिछले कुछ महीनों में, जब तुम मेरे साथ नहीं थे, मुझे अहसास हुआ कि तुम्हारी बेवकूफी भरी बातें ही थीं जो मुझे अंदर से ज़िंदा रखती थीं। मैं मुस्कुराना चाहती थी, पर मैं डरती थी कि कहीं मैं फिर से कुछ खो न दूँ।"

वह पहली और आख़िरी मुस्कान

बारिश की हल्की फुहारें गिरने लगी थीं। समीर ने मीरा की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर इस बार उन आँसुओं में दर्द नहीं, बल्कि एक सुकून था।

समीर ने अपनी जेब से वही पुरानी कागज़ की नाव निकाली, जो अब थोड़ी मुड़ गई थी। उसने वह नाव मीरा की हथेली पर रखी और कहा, "आज बारिश हो रही है मीरा। क्या अब यह नाव किनारे लगेगी?"

मीरा ने नाव को देखा, फिर समीर की आँखों में देखा। और फिर, वह हुआ जिसका समीर को सालों से इंतज़ार था। मीरा के होंठ धीरे से मुड़े, उसकी आँखों में एक चमक आई और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह कोई बनावटी मुस्कुराहट नहीं थी, वह उसकी आत्मा की आवाज़ थी।

समीर ठगा सा रह गया। उसे लगा जैसे दुनिया की सारी खुशियाँ उस एक लम्हे में सिमट आई हों। वह मुस्कुराहट इतनी पवित्र और सुंदर थी कि समीर की अपनी आँखों में नमी आ गई।

"तुम्हें पता है मीरा," समीर ने रुँधे हुए गले से कहा, "जब भी चाहा बस केवल तुम्हारी मुस्कुराहट ही चाही। और आज मुझे मेरा सबसे बड़ा इनाम मिल गया।"

निष्कर्ष

समीर शहर छोड़कर चला गया, पर उनकी दोस्ती का वह अध्याय कभी खत्म नहीं हुआ। मीरा अब बदल गई थी। उसने समीर को वादा किया था कि वह अपनी मुस्कुराहट को कभी खोने नहीं देगी। सालों बाद भी, जब कभी समीर उदास होता, तो उसे मीरा की वह पहली मुस्कान याद आती और उसका दिन संवर जाता।

सच्ची दोस्ती वही होती है जो आपको खुद से रूबरू कराए और आपके सबसे गहरे डर को एक छोटी सी मुस्कुराहट में बदल दे। समीर और मीरा की कहानी आज भी उस कॉलेज की दीवारों में गूँजती है, जहाँ एक दोस्त ने कभी हार नहीं मानी।

Post a Comment

Previous Post Next Post

Smartphones

Advertisement